KavyaPrakash

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काव्यप्रकाशः

श्री मम्मटाचार्यविरचित काव्यप्रकाश हिन्दी व्याख्या

व्याख्याकार : 

स्व० आचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि

काव्यसौन्दर्यको परख करनेवाले शास्त्रका नाम ‘काव्यशास्त्र’ है।

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काव्यप्रकाशः

श्री मम्मटाचार्यविरचित काव्यप्रकाश हिन्दी व्याख्या

व्याख्याकार : 

स्व० आचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि

  • काव्यसौन्दर्यको परख करनेवाले शास्त्रका नाम ‘काव्यशास्त्र’ है।
  • काव्यशास्त्र के प्रारम्भिक युगमें इसके लिए मुव्यरूपसे ‘काव्यालङ्कार’ शब्दका प्रयोग होता था। इसीलिए काव्यशास्त्र के आदि युगके सभी आबापने अपने प्रन्योंका नाम ‘काव्यालङ्कार’ रखा है।
  • भामहका कारिकारूप में लिखा हुआ काव्यशास्त्रका आदि ग्रन्थ ‘काव्यालर’ नामसे हो प्रसिद्ध है। उलूटने भी अपने प्रन्यका नाम ‘काव्यालङ्कारसारसंग्रह’ रखा है।
  • काव्यशास्त्रविषयक ग्रन्थका नाम भी काव्यात है। वामनने सूबरूप में लिखे हुए अपने प्रत्यका नाम भो ‘काव्यालङ्कार’ रखा। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीनकाल में ‘काव्यशास्त्र के लिए ‘काव्यालङ्कार’ नाम ही अधिक प्रचलित पाया जाता है। इस नाममें आया हुआ ‘अलङ्कार’ शब्द सौन्दर्य अर्थको बोधन करनेवाला है।
  • वामनने “सौन्दर्यम् अलङ्कारः सूर अलारशब्दको सौन्दर्यपरक प्रतिपादन किया है। अन्य सब आचायने भी काव्य सौन्दर्याधायक धमाँको हो ‘अलङ्कार’ नामसे व्यवहुत किया, “काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलङ्कारान् प्रचक्षते” आदि वचन मो इसी मत की पुष्टि करते हैं।
  • इस प्रकार काव्यालद्वार’ शब्दका अर्थ काव्य सौन्दर्य होता है और उससे लक्षणा द्वारा काव्यसौन्दर्यपरक शास्त्रका ग्रहण होता है। इसीलिए काव्यसौन्दर्यको परीक्षा के आधारभूत मौलिक सिद्धान्तोंका प्रतिपादन करनेवाले ये सब प्राचीन प्रम ‘काव्यालङ्कार’ नामसे कहे जाते हैं। इन ग्रन्थों में केवल अलङ्कारोंका ही वर्णन नहीं है अपित सौन्दर्यको परीक्षा के लिए गुण, दोष, रोति, अलङ्कार आदि जिन-जिन तत्वोंके ज्ञानको आवश्यकता है।
  • उन सभीका प्रतिपादन किया गया है। इसलिए इन नामों में आये हुए ‘अलङ्कार’ शब्दको सौन्दर्यपरक मानकर काव्यसौन्दर्य प्रतिपादक शास्त्रों के लिए ‘काव्यालङ्कार’ नामका प्रयोग उचित प्रतीत होता है।

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