Kiratarjuniyam

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किरातार्जुनीयम्

प्रथमः सर्गः

टीकाकार

डॉ. रामसेवक दुबे

संस्कृत महाकाव्यों में महाकविभारविविरचित ‘किरातार्जुनीयम्’ का एक विशिष्ट स्थान है।

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Description

किरातार्जुनीयम्

प्रथमः सर्गः

टीकाकार

डॉ. रामसेवक दुबे

  • संस्कृत महाकाव्यों में महाकविभारविविरचित ‘किरातार्जुनीयम्’ का एक विशिष्ट स्थान है।
  • अलङ्कृतकाव्यपद्धति की रचनाओं में यह महाकाव्य मूर्द्धन्य है। काव्यशिल्प के सौष्ठव, पदविन्यास की समीचीनता, रसगर्भनिर्भरता, अलङ्कारयोजना की प्रौढ़ और निरतिशय अर्थगाम्भीर्य के कारण ‘किरातार्जुनीयम्’ चिरकाल से अध्येताओं के लिये एक मानक ग्रन्थ बना हुआ है।
  • इसीलिये प्राचीन काल से इस ग्रन्थ पर अनेक उत्कृष्ट संस्कृत टीकाएँ लिखी गयी हैं। मल्लिनाथ की ‘घण्टापथ’ टीका के अतिरिक्त भरतसेन की ‘सुबोधा’, भगीरथ मिश्र की ‘सर्वमङ्गला’, हरिकान्त की ‘सारावली’, रामचन्द्र की ‘मनोरमा’, मल्ल की ‘बालबोधिनी’, अल्लड़नरहरि की ‘तत्त्वदीपिका’ और राजकुन्द की ‘दुर्घटसङ्गग्रहा’ इत्यादि पर्याप्त प्रसिद्ध हैं।
  • हिन्दी भाषा में भी इस महाकाव्य की अनेक टीकाएँ लिखी गयी हैं; जिनमें से अधिकांश कतिपयसर्गपर्यवसायिनी ही हैं।
  • इनमें से कुछ तो बहुत अच्छी भी हैं। इसी अनुक्रम में हमारे प्रतिभावान् शिष्य डॉ० रामसेवक दुबे ने ‘किरातार्जुनीयम्’ के प्रथम सर्ग पर प्रस्तुत हिन्दी-टीका लिखने का उत्साह दिखाया है।
  • इस बात से मुझे अत्यधिक प्रसन्नता हुई है। जब मैंने पाण्डुलिपि में इस टीका को मनोयोग से पढ़ा तो मुझे तृप्ति और सन्तुष्टि भी मिली।
  • सचमुच, डॉ० दुबे की शब्दार्थविनिर्णयक्षमता और मोहक भाषाशैली बेजोड़ है। उनकी यह रचना निश्चय ही सार्वजनीन अभिनन्दन की अधिकारिणी है। आशा है कि वे अपनी सशक्त लेखनी द्वारा हम लोगों को ऐसी सुखद अनुभूतियों के अवसर निरन्तर उपलब्ध कराते रहेंगे।

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Weight 166 g

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