Sukanasopadesh

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शुकनासोपदेश:

व्याख्याकार:

डॉ. राजेश्वर प्रसाद मिश्र

(श्रीभानुचन्द्रसिद्धान्तचन्द्रकृत-संस्कृतटिकया व्याकरणात्मकटिप्पणीभिः हिन्दीभाषानुवादने विशेषविमर्शेन विषदोपोदघातेन च संवलित)

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शुकनासोपदेश:

व्याख्याकार:

डॉ. राजेश्वर प्रसाद मिश्र

(श्रीभानुचन्द्रसिद्धान्तचन्द्रकृत-संस्कृतटिकया व्याकरणात्मकटिप्पणीभिः हिन्दीभाषानुवादने विशेषविमर्शेन विषदोपोदघातेन च संवलित)

  • वैश्विक मानवसमाज का परस्पर वार्षिक व्यवहार यद्यपि आदिकाल से गद्यमयभाषा में होता आ रहा है, परन्तु इसको साहित्यरूप में प्रस्तुत करने का श्रेय सर्वप्रथम संस्कृतभाषा को ही है।
  • मद्यपि इस भाषा के साहित्य का श्रीगणेश भी पद्यमय (छन्दोबद्ध) साहित्य ‘ऋग्वेद’ से हुआ है, तथापि ‘गद्यं यजुमतम्’ के अनुसार गद्यशैली का प्राचीनतम प्रतिनिधि-ग्रन्थ भी यजुर्वेद है, जो ऋग्वेद का समकालिक ग्रन्थ है तथा जिसका लगभग आधा भाग गद्यमय है।
  • तदनन्तर ब्राह्मणों, आरण्यकों, उपनिषदों, आयुर्वेदिक तथा दार्शनिक ग्रन्थों एवं व्याकरण सम्बन्धी ग्रन्थो महाभाष्य आदि में गद्यमय भाषा का उत्तरोत्तर विकसित रूप दृष्टिगोचर होता है।
  • इस प्रकार गद्य का प्रथम आविर्भाव वैदिक संहिताओं में हुआ जिसका आज तक उत्तरोत्तर विकास होता रहा है। विकास की इसी परम्परा में अलङ्कृत गद्यशैली का रूप सामने आया परन्तु इसका उत्कर्ष गद्य-काव्यों में मिलता है, जिसका प्रारम्भिक रूप महाक्षत्रप रुद्रदामन (१५० ई०) के गिरनार स्थित शिलालेख जैसी प्रशस्तियों में देखा जा सकता है।
  • वस्तुतः गद्य-भाषा की अलङ्कृत गद्यशैली का चरम उत्कर्ष दण्डी, सुबन्धु, बाण आदि की उत्कृष्ट गद्य कृतियों क्रमश: दशकुमारचरित, वासवदत्ता, कादम्बरी आदि में उपलब्ध होता है।

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Weight 110 g

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